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14/12/2014  
मथुरा के मुंशी खान हैं इंसानियत कि पहचान
 
 

मथुरा, हाल ही में आगरा में  हुए धर्मांतरण को लेकर देश के सर्वोच्च सदन में  हगामा हो रहा है वही   देश भर में इस समय जहा राजनैतिक दल एक दूसरे पर साम्प्रदायिकता फेलाने का आरोप लगा कर  वोटो के धुर्वीकरण में लगे हुए हे वही ऐसे में युग युगान्तरो से प्रेम और एकता का सन्देश देने के लिए विश्व के पटल पर अपनी पहचान रखे हुए कृष्ण की नगरी मथुरा में एक बार फिर ऐसी अनोठी मिसाल देखने को मिली हे जो मजहबो की आग में देश और लोगो को बाटने में लगे हुए लोगो के लिए एक मिशाल है , अब हम जो आपको बताने  जा रहे है वह शायद ही आपने पहले कभी देखा और सुना होगा जी हां मुरली वाले की इस पावन नगरी में मुस्लिम समुदाय के एक युवक ने पूरे विधि विधान से कराई पवन पुत्र हनुमान जी की स्थापना, सर पर लगी टोपी जहां इस्लाम की गवाही दे रही थी वही हिन्दुओ के देवी देवताओ में हिन्दुओ से भी बढ़कर आस्था रख कान्हा की नगरी में गंगा जमुना तहजीब की मिशाल को कायम करने में लगे इस सक्श का नाम हे, मुंशी खान मुस्लिम परिवार में भले ही जन्मे हो मगर मुंशी खान इस्लाम को तो मानते ही हे और पाचो वक्त की नवाज भी अता करते हे साथ ही लंबे समय से हिंदू धर्म में भी इनकी आस्था बनी हुई हे और दोनों वक्त के साथ साथ दिन में कई मर्तबा यह संकटो को हरने वाले वीर बजरंगी का स्मरण करते नजर आते है, मुंशी खान की इस आस्था और विश्वाश को देखकर लोगो को सहज ही विश्वास नहीं होता, लोगो का मानना है की मुंशी खान उन लोगो के लिए मिसाल  हे एक दूसरे को  मजहब की आग में झोकना चाहते हे ऐसा नहीं है की मुंशी खान की हनुमान जी में कोई नयी आस्था जगी हो हनुमान जी और मुंशी खान का डोर पिछले कई साल से जुडी हुई हे और एक बार तो खुद हनुमान जी से नवाज पड़ते हुए उसका खुद का सामना हो गया  और उसने जो माँगा उसकी मुराद भी पूरी हुई /अपनी मुराद पूरी होने पर मुंशी खान ने प्रण किया और  उसने लोगो के सहयोग से चंदा इकट्ठा किया और करा डाली हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा ; मुंशी खान  की आस्था केवल मूर्ति की स्थापना तक ही सिमित नहीं थी इसी लिए उसने बकायदा हनुमान जी को चोला चढाया ,बर्क लगाई , माला पहनाई और उतारी अपने इष्ट की आरती ; मुंशी खान का मानना हे की अल्लाह और भगवान सब एक हे और उसने तो इन्सान को इस धरती पर भेजा हे ; हिंदू  मुस्लिम का भेद तो हमारा बनाया हुआ हे ; मुंशी खान की इस आस्था को देख कर उसके साथ रहने वाले लोग मुंशी खान को मुंशी खान ना बुलाकर मुंशी लाल  कह कर बुलाते है और मुंशी लाल  की आस्था को देखकर डॉ इकबाल की वह पंक्तिया याद  आ जाती हे - मजहब नहीं सिखाता आपस में बेर रखना हिंदी हे हम वतन हे हिंदोस्ता हमारा ; के साथ ही महशूर एक शायर की पक्तिया याद आ जाती हे - शेख काबे से चला और हिंदू दहर से एक थी दोनों की मंजिल फेर था कुछ राह का
मथुरा से मदन सारस्वत कि रिपोर्ट

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